सिस्टम पर बढ़ा सवाल कब तक “लावारिस” बनकर दम तोड़ते रहेंगे मरीज?
भूख, प्यास और पहचान के अभाव में तड़पती इंसानियत**



बलरामपुर/आजमगढ़। सरकारी अस्पतालों में “लावारिस” कहे जाने वाले मरीजों की स्थिति एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। नाम-पता या परिजनों की जानकारी न मिल पाने पर मरीजों को लावारिस घोषित कर दिया जाता है। इलाज प्राथमिकता होने के बावजूद पहचान और समुचित देखभाल की ठोस व्यवस्था न होने से वे अक्सर उपेक्षा का शिकार हो जाते हैं।
हादसे से मोर्चरी तक: एक दर्दनाक सफर तहबरपुर स्वास्थ्य केंद्र से 10 जनवरी को रेफर की गई एक घायल महिला को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। चार दिन बाद प्रमुख अधीक्षक डॉ. सतीश चंद्र कनौजिया के प्रयास से ऑर्थो सर्जन द्वारा ऑपरेशन किया गया, लेकिन 14 फरवरी को इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सेप्टिक शॉक और पेट खाली होने का उल्लेख मिला—जो लंबे समय तक भूखे-प्यासे रहने की आशंका को दर्शाता है। 72 घंटे तक मोर्चरी में पहचान की प्रतीक्षा के बाद शव पुलिस को सौंप दिया गया।
पहचान का अभाव, उपेक्षा की इंतहा ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जहां मानसिक रूप से अस्वस्थ या बोलने में असमर्थ मरीजों को पर्याप्त देखभाल नहीं मिल पाती।
घावों में कीड़े पड़ जाना फर्श पर पड़े मरीज की समय पर जानकारी न होना कई शव को चूहों द्वारा नुकसान पहुंचाना
कई बार मृत्यु के बाद ही पहचान संभव हो पाती है, और कभी अंतिम संस्कार के बाद परिजन अस्पताल पहुंचते हैं—लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
व्यवस्था पर बड़ा सवाल
अस्पतालों में लावारिस मरीजों की पहचान और देखभाल के लिए ठोस तंत्र का अभाव साफ दिखाई देता है। भर्ती के बाद परिजनों की तलाश के लिए सक्रिय प्रयास नहीं होते। तकनीकी संसाधनों की कमी और जिम्मेदारियों के बीच समन्वय न होने से मानवता शर्मसार होती है।
अब भी सवाल कायम है…
जब इलाज उपलब्ध है, तो देखभाल क्यों नहीं?
जब तकनीक मौजूद है, तो पहचान क्यों नहीं?




