अमेरिका और इसराइल और ईरान के चल रहे युद्ध की वजह से गैस सिलेंडर की पैदा हुई किल्लत की वजह से शहर से लेकर गांव तक लोगों की रसोई में अजीब सी परेशानी का माहौल देखने को मिल रहा है।आज लोगों को गैस के चूल्हे पर खाना बनाने की आदत पड़ गई जिसकी वजह से लोगों को आज इतनी जद्दोजहद का सामना करना पड़ रहा है।
बताते चलें जिस तरह से खाना पकाने के लिए तेल,मसाले,सब्जियां और दाल,चावल,आटा की व्यवस्था करते हैं।उसी तरह आज से 30/40 साल पहले खाना बनाने के लिए लोग लकड़ी और उपलों की व्यवस्था करते थे और इतना ही नहीं बाकायदा बरसात का मौसम आने से पहले सूखी हुई लड़कियों और उपयोग को अच्छी तरह हिफाजत से रखा जाता था,ताकि महिलाओं को खाना पकाने में कोई परेशानी का सामना न करना पड़े।
बदलते दौर ने लोगों को शारीरिक मेहनत से जरूर बचा लिया,लेकिन कड़वा सच यह है कि आज के दौर में आज की पीढ़ी अंदरुनी रूप से बहुत ही कमजोर हो चुकी है और ज्यादा मेहनत करने से भागती है।
उस दौर में महिलाएं लकड़ी और उपयोग के ऊपर ही पौष्टिक खाना पकाती थीं।जिस तरह आज रोजी रोटी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है,ठीक उसी तरह ईंधन के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी।
लेकिन अपनी मेहनत से लोग सूखी लड़कियां और उपलों की व्यवस्था किसी ने किसी तरह से कर ही लेते थे,लेकिन आज गैस सिलेंडर को लेकर जिस तरह से लोग शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान हैं,उतनी परेशानी उस जमाने में नहीं हुआ करती थी।
आज आधुनिक ज़माना है। नई पीढ़ी तो उन हालात से अनभिज्ञ हैं।इतने दिनों में हालात ने बहुत करवटें ली हैं।गैस सिलेंडर की किल्लत को देखते हुए,पुरानी यादों को ताजा कर दिया है।
हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में इसका असर थोड़ा कम है,लेकिन शहरी क्षेत्रों असर ज्यादा दिखाई पड़ रहा है।आज भी ग्रामीण इलाकों लकड़ी और उपलों का इस्तेमाल किया जाता है,लेकिन पहले की अपेक्षा बहुत कमी आई है।
क्योंकि बदलते हुए आधुनिक ज़मानें में लोग लगभग ढ़ल चुके है।अगर देखा जाय बदले ज़माने में अपनी पुरानी यादें और कल्चर आईना बनकर सामने आते है।




